Tuesday, 8 November 2011

मतलबी दुनिया है साहेब,

अलां मतलबी है,,
फलां मतलबी है...
और मैं कहता हूँ,
मतलबी दुनिया है साहेब, 
कई महीनों तक गणेश जी को पूजा,
कई बार इन के चरणों को छू कर तिलक माथे लगाया,
कई बार इन्ही के आसरे दिन को गुजारा ....

पर जैसे ही गणेशजी ने चमक खोई ...
तुरंत बाहर का रास्ता दिखाया..

हम तो इंसान है साहेब,
जब दुनिया भगवान को नहीं बकशती ...
तो हम जैसों को कहाँ बक्शेगी, 

निचोड़ लो जितना निचोडना है,
उसके बाद फैंक दो,
माने - दूध से मक्खी माफिक.

16 comments:

  1. मेरी कुछ क्षणिकाएं कुछ इसी विषय पर हैं.... "दिवाली के बाद : कुछ चित्र" ... अच्छा लगा कि आप जैसा मैं भी सोच सका

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  2. wah...bahut khoob saheb...karara mara...lajabab...

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  3. मौजूदा दौर में इंसानों की मतलबपरस्‍ती पर चोट करती रचना।
    बहुत खूब .....

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  4. यथार्थपरक पंक्तियाँ. बधाई.

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  5. yahi to insaan hai....
    jo sirf apna hai
    jiska koi nahi
    yaha tak ki
    na hi uska koi bhagwaan hai...

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  6. समाज की हकीकत

    बहुत सुंदर पोस्ट
    शुभकामनाएं

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  7. बिलकुल सही विचार हैं

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  8. बहुत बढ़िया....कुछ ऐसा जो आमतौर पर पढ़ने नहीं मिला करता..। मेरे पोस्ट पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं ।.बधाई ।

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  9. बेचारे गणेश जी ... इन्हें क्या पता था की इंसान ही भगवान बन जायगा ....

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  10. प्रकृति निर्मित चीज़ें हों या मानव निर्मित, सब का हश्र एक जैसा होता है. लेकिन आस्था को सत्य का आईना दिखाना बहुत बड़ी बात है.

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  11. हे भगवान ! कितने निर्मोही हैं या स्वार्थी हैं हम !

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  12. सही कहा दीपक जी, ये दुनिया मतलबी ऐसी ही है.
    बहरहाल आपके इस ब्लॉग पर आप की नज़र ने काफी बढ़िया फोटो सजा रहे है. बहुत सुंदर.

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